Tuesday, February 4, 2025

गुप्त नवरात्रि

 गुप्त नवरात्रि, जो वर्ष में दो बार माघ और आषाढ़ मास में मनाई जाती है, विशेष तांत्रिक साधनाओं और देवी दुर्गा की दस महाविद्याओं की उपासना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस वर्ष, माघ गुप्त नवरात्रि 30 जनवरी 2025, गुरुवार से शुरू होकर 6 फरवरी 2025, शुक्रवार को समाप्त होगी।

गुप्त नवरात्रि के दौरान, साधक मां दुर्गा की दस महाविद्याओंकाली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, और कमला देवीकी गुप्त रूप से पूजा-अर्चना करते हैं। यह समय तंत्र साधना और विशेष अनुष्ठानों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

भीष्माष्टमी

 

भीष्माष्टमी - हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो महाभारत के प्रमुख पात्र भीष्म पितामह की पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है।ह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ता है, जो आमतौर पर जनवरी-फरवरी के महीनों में आता है।

भीष्माष्टमी की तिथि:

भीष्माष्टमी 5-फरवरी-2025-बुधवार को मनाई जाएगी। ष्टमी तिथि 5 फरवरी को प्रातः 2:31 बजे से शुरू होकर 6 फरवरी को रात्रि 12:36 बजे समाप्त होगी

पौराणिक कथा:

महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, जिसके कारण उन्होंने अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुना। उन्होंने माघ शुक्ल अष्टमी के दिन, जब सूर्य उत्तरायण होते हैं, अपने प्राण त्यागे। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, उत्तरायण के दौरान मृत्यु होने पर आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि:

1. स्नान: रात्र काल पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करें। यदि यह संभव हो, तो घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

2. तर्पणस्नान के बाद, तर्पण की प्रक्रिया करें, जिसमें तिल और जल अर्पित किया जाता है। यह क्रिया भीष्म पितामह और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए की जाती है।

3. श्राद्ध: दिन एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है, जो विशेष रूप से उन लोगों द्वारा किया जाता है जिनके पिता जीवित नहीं हैं। हालांकि, कुछ परंपराओं में इसे सभी लोग कर सकते हैं।

4. व्रत: भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और शाम को संकल्प लेकर अर्घ्य प्रदान करते हैं। अर्घ्य देते समय भीष्माष्टमी मंत्र का जाप किया जाता है।

महत्व:

भीष्माष्टमी  का व्रत और पूजा करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है अन्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपतियों को लाभ होता है।स प्रकार, भीष्माष्टमी का पर्व भीष्म पितामह के त्याग, निष्ठा और धर्म के प्रति समर्पण को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है।

अचला- सप्तमी

अचला- सप्तमी, जिसे रथ सप्तमी, भानु सप्तमी और माघी सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है।ह माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है।ौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन सूर्य देव ने अपनी दिव्य ज्योति से पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित किया था।

अचला- सप्तमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त:

वर्ष, अचला-सप्तमी 4 फरवरी 2025, मंगलवार को मनाई जाएगी।ूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 5:23 बजे से 7:08 बजे तक है।

पूजा विधि:

1. स्नान: ्रातः काल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करें। यदि यह संभव हो, तो घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

2. सूर्य अर्घ्य: ्नान के बाद, तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन, तिल, गुड़, चावल और दूर्वा मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय " घृणि सूर्याय नमः" मंत्र का जाप करें।

3. पूजा: ूर्य देव की पूजा में लाल फूल, धूप, दीप आदि का उपयोग करें। आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें और सूर्य मंत्रों का जाप करें।

4. व्रत: दिन नमक और तेल का सेवन वर्जित माना गया है। केवल मीठे भोजन या फलाहार का सेवन करें।

5. दान: ्नान और पूजा के बाद, वस्त्र, तिल, गुड़, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करें। किसी जरूरतमंद व्यक्ति को मीठा भोजन कराएं।

महत्व:

अचला-सप्तमी के व्रत और पूजा से व्यक्ति को संतान सुख, रूप, यश और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।ान्यता है कि इस दिन व्रत करने से सभी रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।अचला-सप्तमी के दिन सूर्य देव की उपासना से कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है, जिससे सरकारी क्षेत्र, अधिकारी वर्ग, मान-प्रतिष्ठा, सामाजिक संपन्नता आदि में शुभ फल प्राप्त होते हैं।स प्रकार, अचला-सप्तमी का व्रत और पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।